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परमेश्वर, अच्छा शासक और सृष्टिकर्ता


बाइबल इसे कैसे वर्णन करती है

हे हमारे प्रभु और परमेश्वर, तू ही महिमा,आदर और सामर्थ के योग्य है, क्योंकि तू ने ही सब वस्तुओं को सृजा,और उनका अस्तित्व और उनकी सृष्टि तेरी ही इच्छा से हुई।(प्रकाशितवाक्य 4:11)

मसीही संदेश की नींव यह है कि परमेश्वर समस्त वस्तुओं का एक सच्चा और जीवित शासक है। वह उपस्थित प्रत्येक वस्तुओं का राजा और स्वामी है। अन्य मानव शासकों के विपरित, परमेश्वर भ्रष्ट या स्वार्थी नहीं है। वह सम्पूर्ण रीति से अच्छा और प्यार करने वाला शासक है जो अपनी सृष्टि के लिए अच्छी वस्तुएं उदारता से प्रदान करता है और न्याय से शासन करता है।

परमेश्वर प्रत्येक वस्तु का शासक है क्योंकि उसी ने सब कुछ बनाया है। परमेश्वर उन सभी वस्तुओं का स्रोत और निर्माता है जो उपस्थित हैं, यहाँ तक कि वह सुन्दर संसार भी इसमें सम्मिलित है यह उसका संसार है,उसने इसे सृजा है, एवं वह इसका अधिकारी है।

उसनें हमें भी बनाया है।

परमेश्वर ने मानव की रचना की, और हमें इस अच्छे संसार में और अपने स्वंय में एक अनुठा स्थान दिया। उसने हमें संसार पर शासन करने के लिए अधिकार दिया कि हम इसकी देखभाल करें, और इसके लिए हमें जिम्मेदारी दी – कि हर समय हमें अपने शासक का सम्मान के रूप में उसकी आज्ञा का पालन करना, और उसकी उदारता के लिए उसका धन्यवाद करते रहना है।

सारांश
  • परमेश्वर संसार का शासक है।
  • उसने संसार की रचना की है।
  • उसने हमें अपने अच्छे संसार पर शासन करने के लिए बनाया उसे धन्यवाद और सम्मान देते हुए शासन करें।
इस प्रकार परमेश्वर ने वस्तुओं की सृष्टि कि परन्तु अब हमारा अनुभव बिल्कुल स्पष्ट है कि यह संसार ऐसा नहीं है। पर क्या हुआ?
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परमेश्वर के विरूद्ध हमारा विद्रोह


बाइबल इसे कैसे वर्णन करती है

हम तो सब के सब भेड़ों के समान गए भटक गए थे, हम में से प्रत्येक ने अपना अपना मार्ग लिया… (यशायाह 53:6 क)

हमारे जीवन और संसार में जो कुछ भी गलत है मानवता द्वारा किए गए दुर्भाग्यपूर्ण चुनाव से उपजा है। आरम्भ से ही, हम परमेश्वर को अपने ऊपर शासन करने नहीं देना चाहते थे, हमने अपने तरीके से जीने का निर्णय करके उसे परमेश्वर के रूप में निरस्त कर दिया, और उसकी आज्ञा का उल्लंघन किया।

अपने जीवन में हम सभी ऐसा करते हैं।

अधिकांश समय, हम केवल परमेश्वर की उपेक्षा करते हैं या उसे दूर रखते हैं, और अपना जीवन स्वयं जीने लगते हैं। हमारे उदार सृष्टिकर्ता और प्रबन्धक का  हमें जैसा धन्यवाद देना चाहिए नहीं देते हैं। हम अपने शासक का एवं उसकी आज्ञा पालन नहीं करते हैं। हम अपनी इच्छाओं और प्राथमिक्ताओं का पालन करते हैं, और हम स्वयं अपने द्वारा निर्णय लिए गए सर्वश्रेष्ठ मूल्यों पर जीते हैं (चाहे धार्मिक, धर्मनिरपेक्ष, या दोनो का मिश्रण हो)।

सामान्य बाइबल शब्द इस विद्रोही रूख के लिए परमेश्वर के प्रति “पाप” है, और हम सब इसे करते हैं चाहे हम किसी भी विशेष पंथ अनुसरण करें या नहीं।

हम स्वयं को छोटे “देवताओं” से भरे संसार में पाते हैं, जिनमें से हम प्रत्येक काम को अपने तरीके से कर रहें हैं, हम में से प्रत्येक स्वार्थी रूप से कोशिश कर रहा है; कि संसार और अन्य लोगों को अपनी इच्छा से मोड़ें।

यह बहुत ही आश्चर्य की बात है कि यह काम नहीं करता है। हमारा स्वशासन असफल हो जाते है औऱ हम इसके परिणाम भुगतते हैं, इसमें हमारे द्वारा की गई हानि भी सम्मिलित है जो हम अपने आप को, साथ ही हमारे आसपास के लोगों को तथा जिनके मध्य हम रहते हैं उन्हें भी हम हानि पहुँचाते हैं।

सारांश
  • हम में से प्रत्येक ने अपने जीवन को स्वयं अपने तरीके से संचालित करके, परमेश्वर को अपने शासक के रूप में अस्वीकार किया है।
  • हम परमेश्वर के मार्ग का विद्रोह करके अपने आप की एवं एक-दूसरे की तथा संसार की हानि पहुंचाते हैं।
प्रश्न यह है कि: परमेश्वर हमारे साथ विद्रोह के विरुद्ध क्या करेगा ?
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परमेश्वर का न्याय


बाइबल इसे कैसे वर्णन करती है

जैसे मनुष्यों के लिए एक बार मरना और उसके बाद न्याय का होना नियुक्त किया गया है…(इब्रानियों 9:27)

किसी भी अच्छे शासक की तरह, परमेश्वर हमारी चिन्ता करके हमारे विद्रोह को भी गंभीरता से ही लेता है। वह हमें हमारे कार्य के लिए उत्तरदायी ठहराता है क्योंकि यह उसके लिए अर्थ रखता है कि हम उसका अपमान करते हैं, और हम दूसरे लोगो के साथ बुरा व्यवहार करते हैं, और उसके संसार को बर्बाद कर देते हैं।

दूसरे शब्दों में, परमेश्वर विद्रोही को सदैव के लिए विद्रोह करने नहीं देगा।

ऐसा  करना उस के लिए अन्याय होगा।

मृत्यु की वास्तविकता में हम अपने विद्रोह के विरुद्ध परमेश्वर के न्याय का अनुभव करते हैं। सताव और मृत्यु स्वाभाविक नहीं है। परन्तु संसार में भ्रष्टाचार, विनाश और मृत्यु मानवता द्वारा परमेश्वर को अस्वीकार करने द्वारा हम में से प्रत्येक दण्ड के भागी हैं।

किन्तु एक और निर्णय का हम सामना करेंगे। एक दिन हम सब परमेश्वर के सम्मुख खड़े होंगे, और हमारे जीवन के लिए, हमारे द्वारा किए गए हानि के लिए, और हमारे व्यक्तिगत शासक के रूप में उसे अस्वीकार करने के लिए हमें उसे लेखा देना होगा।

उस दिन परमेश्वर हमें जो दण्ड देगा वह जो हमने माँगा है – जो उससे अलग होना है। वह हमें अपने से सदैव के लिए अलग कर देगा। और जैसा कि परमेश्वर सभी अच्छी वस्तुओं और जीवन का स्रोत है उससे अलग होने का अर्थ ऐसा विनाश जो कभी समाप्त न होगा।

परमेश्वर के न्याय दण्ड के निर्णय के अन्तर्गत आना, यह एक भयानक बात है। एक संभावना है जिसका हम सभी को सामना करना है, क्योंकि परमेश्वर के विरूद्ध विद्रोह करने के द्वारा, हम सभी दोषी हैं।

सारांश
  • परमेश्वर सदैव हमें उसके विरूद्ध, विद्रोह नहीं करने देगा।
  • विद्रोह के लिए परमेश्वर दण्ड मृत्यु और न्याय है।
यह सुनना कठीन है इसका अर्थ है कि हम सब अत्यधिक कठिनाई में हैं, परन्तु यह कहानी का अन्त नहीं है।
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परमेश्वर ने यीशु मसीह को हमारे लिए मरने के लिए भेजा.


बाइबल इसे कैसे वर्णन करती है

हम सब के सब भेड़ों के सामान भटक गए थे,हम में से प्रत्येक ने अपना अपना मार्ग लिया,परन्तु यहोवा ने हम सब के अधर्म का बोझ उसी पर लाद दिया। (यशायाह 53:6)

परमेश्वर जिसने सृष्टि को बनाया है, वह उस सृष्टि से प्यार करता है, और वह हमसे भी प्यार करता है। उसने हमें अपने विद्रोह के परिणाम भुगतने के लिए छोड़ नहीं दिया। उसने हमें बचाने के लिए अपने ईश्वरीय पुत्र को संसार मे भेजा:वह मनुष्य यीशु मसीह है।

हमारी तरह, यीशु ने परमेश्वर के विरूद्ध विद्रोह नहीं किया। वह सदैव परमेश्वर के शासन के अधीन रहा, और उसका आदर और धन्यवाद करता रहा और प्रत्येक बात में उसकी आज्ञा पालन किया। वह किसी भी तरह परमेश्वर के न्याय के योग्य नहीं था। वह मृत्यु के योग्य नहीं था।

फिर भी यीशु की मृत्यु हुई। यद्यपि उसके पास बीमारों के चंगा करने और मरे हुओं को भी जिलाने की परमेश्वर की सामर्थ थी, फिर भी यीशु ने स्वंय के लिए रोमी क्रूस पर मृत्यु की अनुमति दी। क्यों ?

अद्भुत समाचार यह है कि यीशु की मृत्यु हम जैसे विद्रोहियों के लिए एक विकल्प के रूप में हुई। उसने स्वंय क्रूस पर मरने के द्वारा हमारे बदले में दण्ड सहा जिस दण्ड के हम स्वयं भागीदार थे। विद्रोह की सजा मृत्यु है और वह स्वयं मर गया हमारी मृत्यु के स्थान में।

यह सब हमारे द्वारा पूरी तरह से अनुपयुक्त  है। हमने परमेश्वर का तिरस्कार किया, परन्तु परमेश्वर के बड़े प्रेम के कारण उसने अपने पुत्र को हमारे लिए मरने को भेजा।

सारांश
  • परमेश्वर ने अपने प्रेम के कारण अपने पुत्र को जगत में भेजा:मनुष्य यीशु मसीह।
  • यीशु सदैव परमेश्वर के अधीन रहा।
  • परन्तु यीशु ने हमारे स्थान पर मरने के द्वारा हमारे दण्ड को स्वयं ले लिया।
परन्तु इतना ही नहीं।
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यीशु, पुनरुत्थित शासक और उद्धारकर्ता


बाइबल इसे कैसे वर्णन करती है

हमारे प्रभु यीशु मसीह के पिता परमेश्वर की स्तुति हो, जिसने यीशु मसीह के मृतकों में से जिला उठाने के द्वारा, अपनी अपार दया के अनुसार, एक जीवित आशा के लिए हमें नया जन्म दिया…( 1 पतरस 1:3)

परमेश्वर ने यीशु की मृत्यु को हमारे पापों के पूर्ण भुगतान के रूप में स्वीकार किया और उसे मरे हुओं में से जिलाया। यीशु ने मृत्यु को हराया, और पुनरूत्थित हो गया। जो मानवता सदैव से जैसा चाहती थी : परमेश्वर के संसार का शासक।

परमेश्वर के शासक के रूप में, यीशु को संसार का न्यायाधीश भी नियुक्त किया गया है। जब यीशु फिर से आयेंगे और न्याय का दिन आएगा, यीशु ही वह होगा जो हमें परमेश्वर के विरूद्ध विद्रोह के खाते का न्याय देने के लिए हमें बुलाएगा।

परन्तु यीशु परमेश्वर का नियुक्त राजा और न्यायी भी है; वह उद्धारकर्ता, न्यायकर्ता भी है. हमारे स्थान में उसकी मृत्यु के कारण, वह अब हमारे सभी पापों को क्षमा करने को तैयार है। उसने उसका मूल्य पहले से ही चुका दिया है। अब हम परमेश्वर के साथ एक नया आरम्भ स्थापित सकते हैं, लम्बे समय से विद्रोहियों के रूप में नहीं परन्तु कुलीन मित्र के रूप में, उसके लिए उसे सभी सम्मान और धन्यवाद देना है।

यह नया जीवन जो यीशु हमें प्रदान करता है, परमेश्वर स्वंय अपनी आत्मा के द्वारा हमारे अन्दर प्रवेश करता है। हम परमेश्वर के साथ एक नये सम्बन्ध के आनन्द का अनुभव कर सकते है।

हमें पूर्ण रूप से यह भरोसा रखना है कि जब यीशु अपनी पूर्ण महिमा में आएगें तो वह हमें स्वीकार करेंगे। – इसलिए नहीं कि हम इस योग्य हैं, किन्तु  इसलिए कि उसने हमारे स्थान पर स्वयं मृत्यु को प्राप्त कर हमारा दण्ड चुका दिया।

सारांश
  • परमेश्वर ने यीशु को संसार का राजा और न्यायी के रूप में फिर से जीवित किया।
  • यीशु ने मृत्यु को जीत लिया है, अब वह क्षमा और नया जीवन दे सकता है। और वह पुनः महिमा में लौटेगा।
हाँ, वह हमें कहाँ छोड़ता है ? वह हमें जीने के दो मार्गों में एक स्पष्ट चुनाव के मध्य में छोड़ता है।
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जीने के दो मार्ग


बाइबल इसे कैसे वर्णन करती है

जो पुत्र पर विश्वास करता है, अनन्त जीवन उसका है, परन्तु वह जो पुत्र की नहीं मानता जीवन नहीं देखेगा परन्तु परमेश्वर का प्रकोप उस बना रहता है।”… ( यूहन्ना 3:36)

जीने का पहला तरीका यह है कि हम परमेश्वर के विरूद्ध अपने विद्रोह में बने रहें – परमेश्वर की उपेक्षा करना और अपने जीवन के मार्ग में स्वयं चलना। दुखद बात है कि यह वह मार्ग है जिसे बहुत से लोग चुनते है

इस तरह जीने मे परमेश्वर का सही निर्णय और अंतिम परिणाम अपरिहार्य है। हमें न केवल अभी परमेश्वर को अस्वीकार करने के हानिकारक परिणाम यहाँ मिलेंगे परन्तु उसके पास से हम अलगाव की अनंत काल की भयानक संभावना का सामना भी करेंगे।

परन्तु एक और मार्ग है। अगर हम परमेश्वर की ओर मुड़े और उससे क्षमा मांगें, यीशु पुनर्जीवित शासक और उद्धार कर्ता के रूप में उस पर भरोसा करें, तब सब कुछ बदल जाऐगा।

आरम्भ करने के लिए, परमेश्वर हमारे स्लेट को साफ करते हैं। वह यीशु की मृत्यु को स्वीकार करता है हमारे पापी विद्रोह के लिए भुगतान के रूप में, और हमें स्वतंत्र रूप से और पूरी तरह से क्षमा कर देता है। वह अपनी आत्मा हमारे हृदय में उंडेलता है और हमें एक नया जीवन देता है जो पिछली मृत्यु को अनन्त काल का जीवन में बदलता है। अब हम विद्रोही नहीं हैं, परन्तु परमेश्वर के अपने परिवार के हिस्से हैं। अब हम परमेश्वर के पुत्र यीशु राजा के साथ रहते हैं जो हमारा शासक हैं।

सारांश

यहाँ जीने के केवल दो मार्ग हैं।

हमारे मार्ग

  • परमेश्वर को शासक के रूप मे अस्वीकार करना
  • अपने तरीके से जीवन जीना
  • स्वयं के विद्रोह से क्षतिग्रस्त होना
  • मृत्यु और दण्ड का सामना करना।

परमेश्वर का नया मार्ग

  • यीशु को अपने शासक के रूप मे समर्पण करें।
  • यीशु की मृत्यु और जी उठने पर भरोसा करें।
  • परमेश्वर द्वारा क्षमा किया गया
  • एक नया जीवन प्राप्त करें जो सदैव के  लिए रहता है।

तो, आप किस तरह से जीना चाहते हैं?

कैसे प्रतिउत्तर दें

“कि आप किस मार्ग को चुनकर जीना चाहेगें?” यदि आप का उत्तर इस प्रश्न का है कि हम “अपने मार्ग को चुनेगें” तो सम्भवत: कुछ या सब कुछ उन बातों पर विश्वास नहीं करते है जो इस पुस्तिका में लिखी गई हैं। शायद आप विश्वास नहीं करते कि हम वास्तव में परमेश्वर के विरूद्ध विद्रोही हैं, या कि यीशु मृतकों में से जी उठे।

यदि ऐसा है, तो कृपया ध्यान से सोचें और आगे बढ़ने से पहले कुछ और जाँच करें। सुनिश्चित हुए बिना इस संदेश को अस्वीकार करने के लिए दांव बहुत बढ़ें हैं। शायद आप यीशु के बारे में निहित उनके जीवन की चार आत्मकथाओं में से एक जो बाइबिल का नया नियम – मत्ती, मरकुस, लूका और यूहन्ना के सुसमाचार में स्वयं पढ़ सकते हैं। शायद आप इसे किसी एक मसीही मित्र के साथ पढ़ सकते हैं। (यदि आप के पास बाइबिल नहीं है तो आप बाइबिल के लिए bible.com/hi पर जाएं, जहाँ आपको आधुनिक अंग्रेजी अनुवाद मिलेगा जिसे इस पत्र में उद्धृत किया गया है।)

यद्यपि आप अच्छी तरह से जानते हैं कि आप परमेश्वर  के विरूद्ध विद्रोही हैं, और पीछे मुड़कर परमेश्वर के मार्ग पर चलना शुरू करना चाहते हैं, तो कैसे करें? आप ऐसा करें।

तीन सरल कदम है: बात करें, समर्पण करें एवं विश्वास करें।

1. परमेश्वर से बात करें

पहला कदम यह है कि समान्य रीति से परमेश्वर से बात करें, और यह स्वीकार करें कि आप ने उस से बलवा किया है तथा आप अब दण्ड के पात्र हैं, आप स्वयं अपने स्थान पर यीशु कि मृत्यु के आधार पर उससे क्षमा के लिए कहें। आपकी सहायता करने के लिए परमेश्वर से कहें और विद्रोही जीवन जीने के स्थान पर ऐसा व्यक्ति बनने में सहायता करें जो  यीशु को शासक के रूप में उसके साथ जीवन जीने वाला व्यक्ति हो। आप कुछ इस तरह से प्रार्थना कर सकते है::

प्रिय परमेश्वर,

मुझे पता है कि मैं आपके द्वारा स्वीकार किए जाने के योग्य नहीं हूँ। मैं अनन्त जीवन के आपके उपहार के योग्य पात्र नहीं हूँ। मैं विद्रोह का दोषी हूँ और मैंने आपके विरूद्ध आपको अनदेखा किया है। मुझे खेद है, मुझे क्षमा और आपकी आवश्यक्ता है।

अपने बेटे को मेरे लिए मरने, भेजने के लिए धन्यवाद ताकि मुझे क्षमा क्षमा प्राप्त हो सके। धन्यवाद मुझे नया जीवन देने के लिए वह मृतको में से जी उठा।

कृपया मुझे क्षमा करें और मुझे बदल दें ताकि मैं जीवित रह सकूं, मेरे शासक यीशु के साथ। आमीन।

2. यीशु के अधीन हो जाएं

दूसरा कदम पहले कदम के बाद आता है। ऊपर जिस तरह की प्रार्थना है, आप भी प्रार्थना करने का अभ्यास करना चाहेंगे – अर्थात् वास्तव में यीशु आपके साथ शासक के रूप में रहता है।

आपके जीवन में कई तरह के क्षेत्र होंगे जिन्हें बदलने की आवश्यक्ता है। पुरानी विद्रोही आदतों को छोड़ना होगा (जैसे लोभ, क्रोध, स्वार्थ और इसी तरह) और परमेश्वर को सम्मान देने वाली कुछ नई आदतों को लेना होगा (उदारता, दया, प्रेम, और धैर्य के समान)।

यह दूसरा कदम आपके जीवन भर चलता रहेगा, परन्तु परमेश्वर हर तरह से आपके साथ रहेगा। उसके वचन बाइबल को पढ़ने  के द्वारा वह आपसे बात करता रहेगा; जब आप उससे प्रार्थना करते हैं तो वह आपकी बात सुनता रहेगा; और आपकी सहायता करता रहेगा; बदलने के लिए और नए तरीके से जीने के लिए वह आप को अपनी आत्मा से सामर्थ देगा, जो आपके अन्दर रहता है; और आप उनके साथ निरन्तर मिलते रहें। वह अन्य मसीहीयों को भी आप को प्रोत्साहित करने के लिए प्रदान करेगा।

तो दूसरा कदम यीशु के आधीन होना और उसके साथ उसे अपने शासक के रूप में स्वीकार करके जीवन जीने के लिए आरम्भ करना है।

3. यीशु पर भरोसा रखें

तीसरा कदम भी जारी रखना है। आपको अपना भरोसा सही स्थान में बनाए रखने की आवश्यक्ता है।

यह केवल यीशु (और उनकी मृत्यु और पुनरूत्थान) के कारण है कि आपको क्षमा किया  जा सकता है और परमेश्वर के साथ सही रखा जा सकता है।

उसके पास आपको बार -बार आना होगा, क्योंकि जैसे-जैसे आप परमेश्वर के नये तरीकों से जीवन जीना आरम्भ करते हैं, आप अभी भी असफल होंगे और गलती करेंगे। हम सब भी गलत करते हैं। हम सभी को अपनी क्षमा के लिए एकमात्र आधार के रूप में क्रूस पर यीशु की मृत्यु को देखते रहना चाहिए।

हमें कभी भी उस पर – और केवल उसी पर- भरोसा करना बन्द नहीं करना चाहिए- जैसे कि वह साधन जिसके द्वारा हमें क्षमा किया जाता है और अनन्त जीवन दिया जाता है।


यदि आप ये कदम उठाते हैं, तो आप निश्चिंत हो सकते हैं कि वास्तव में परमेश्वर ने आपको क्षमा कर दिया और आपको एक नया जीवन दिया है।

यदि आपने अभी तक परमेश्वर को इस तरह से प्रतिउत्तर नहीं दिया है, तो आप समान्य रीति से आश्वस्त रहें कि आप उसके न्याय दण्ड के अधीन हैं।

सड़क में एक कांटा है। जीने के दो ही तरीके हैं। यह वह मार्ग है जिसका हम सभी सामना करते हैं।